हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाह शहीद सय्यद अली ख़ामेनेई ने “शरई उज़्र के दिनो में ज़ियारत-ए-आशूरा और दुआएं पढ़ने” से संबंधित एक इस्तिफ्ता का जवाब दिया है, जिसे इच्छुक पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है।
महिलाओं और पुरुषों के शरई उज़्र के दिनो के दौरान ज़ियारत-ए-आशूरा और दुआएं पढ़ना
सवाल:
- क्या जुनुब व्यक्ति या माहवारी वाली महिला के लिए ज़ियारत-ए-आशूरा पढ़ना जायज़ है या इसमें कोई परेशानी है?
- दूसरी दुआएं पढ़ना या कुरआन पढ़ना कैसा है?
- कर्बला की मिट्टी से बनी सज्दागाह पर सिर रखना कैसा है?
जवाब:
इसमें कोई परेशानी नहीं है। लेकिन जिन सूरों में वाजिद सजदा है, उनकी केवल सजदे वाली आयतें माहवारी वाली महिला के लिए पढ़ना हराम है। कुरआन की अन्य आयतें पढ़ने में कोई परेशानी नहीं है, हालांकि यह मकरूह है।
यह भी मुस्तहब है कि माहवारी वाली महिला नमाज़ के समय अपने शरीर को खून से पाक करे, रुई और कपड़ा बदल ले, वुज़ू करे और अगर वुज़ू नहीं कर सकती तो तयम्मुम करे। इसके बाद नमाज़ की जगह पर क़िबला की ओर मुंह करके बैठे और ज़िक्र, दुआ और सलवात में व्यस्त रहे।
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